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प्रकृति संरक्षण का संकल्प प्रत्येक नागरिक का दायित्व:ईंजीनियर निर्मल माथुर

जोधपुर l विश्व जिस सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है, वह केवल प्रदूषण या बढ़ती गर्मी का संकट नहीं, बल्कि प्रकृति के असंतुलन का स...






जोधपुर l विश्व जिस सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है, वह केवल प्रदूषण या बढ़ती गर्मी का संकट नहीं, बल्कि प्रकृति के असंतुलन का संकट है।
मानव ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का निरंतर दोहन किया है। परिणामस्वरूप नदियाँ सिकुड़ रही हैं, जंगल समाप्त हो रहे हैं, पहाड़ खोखले हो रहे हैं, समुद्र प्रदूषित हो रहे हैं, भूजल स्तर गिरता जा रहा है और शुद्ध वायु तथा स्वच्छ जल जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ भी संकट में पड़ती जा रही हैं।
ऐसी स्थिति में विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिवस नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सामूहिक जागरूकता का अवसर है।
आज आवश्यकता केवल पेड़ लगाने की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता को बचाने की है।

प्रकृति का संतुलन किसी एक तत्व पर नहीं टिका है।
नदियाँ, पर्वत, समुद्र, झरने, जंगल, चारागाह, कृषि भूमि, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, सूक्ष्म जीव तथा समस्त प्रकार के पेड़-पौधे — ये सभी मिलकर पर्यावरण का विशाल तंत्र बनाते हैं। यही जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन को संतुलित बनाए रखती है।

यदि जंगल कटेंगे तो वर्षा प्रभावित होगी,
यदि नदियाँ प्रदूषित होंगी तो जल संकट बढ़ेगा,
यदि पशु-पक्षियों की प्रजातियाँ समाप्त होंगी तो खाद्य श्रृंखला और प्राकृतिक चक्र टूटेंगे,
यदि भूमि बंजर होगी तो अन्न संकट उत्पन्न होगा।

प्रकृति का प्रत्येक घटक एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
किसी एक कड़ी के कमजोर होने का प्रभाव सम्पूर्ण पृथ्वी पर पड़ता है।

आज जलवायु परिवर्तन के रूप में प्रकृति हमें स्पष्ट चेतावनी दे रही है।
धरती का लगातार बढ़ता तापमान, असामान्य वर्षा, भीषण गर्मी, बाढ़, सूखा, चक्रवात, ग्लेशियरों का पिघलना और मौसम चक्र में तेजी से हो रहे बदलाव मानव जीवन के लिए गंभीर खतरे बनते जा रहे हैं।

कभी अत्यधिक वर्षा से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है, तो कभी वर्षा के अभाव में खेत सूख जाते हैं।
कहीं जंगलों में आग लग रही है, तो कहीं समुद्री जल स्तर बढ़ने से तटीय क्षेत्र संकट में हैं।
यदि समय रहते मानव समाज नहीं संभला, तो आने वाली पीढ़ियों को जल, अन्न और शुद्ध वायु के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है।

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों, संस्थाओं या कुछ जागरूक लोगों की जिम्मेदारी नहीं है।
यह प्रत्येक नागरिक का नैतिक, सामाजिक और मानवीय दायित्व है।
जब तक जनभागीदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक प्रकृति संरक्षण के प्रयास अधूरे रहेंगे।

हम अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन लाकर भी पर्यावरण संरक्षण में बड़ा योगदान दे सकते हैं —

🌱 अधिक से अधिक पेड़ लगाना तथा लगाए गए पौधों का संरक्षण करना।
🌱 वर्षा जल संचयन अपनाकर जल बचाना।
🌱 नदियों, तालाबों एवं जल स्रोतों में कचरा और रसायन प्रवाहित न करना।
🌱 प्लास्टिक एवं पॉलीथिन का न्यूनतम उपयोग करना।
🌱 बिजली, ईंधन एवं प्राकृतिक संसाधनों का संयमित उपयोग करना।
🌱 सार्वजनिक परिवहन, साइकिल एवं साझा वाहनों को बढ़ावा देना।
🌱 जैविक खेती और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को अपनाना।
🌱 पक्षियों एवं वन्य जीवों के संरक्षण के प्रति संवेदनशील होना।
🌱 घरों और सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता बनाए रखना।
🌱 बच्चों और युवाओं में पर्यावरण के प्रति जागरूकता विकसित करना।
 🌴भोजन, जल और ऊर्जा की अनावश्यक बर्बादी रोकना।
🌱 स्थानीय वृक्षों, जलस्रोतों और हरित क्षेत्रों को बचाने के लिए सामुदायिक प्रयास करना।

स्मरण रहे —
केवल विकास ही मानवता की पहचान नहीं है,
बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना ही वास्तविक सभ्यता है।

यदि हम आज पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग होंगे, तभी आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य प्राप्त कर सकेंगी।
अन्यथा प्रकृति का असंतुलन मानव अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा संकट बन जाएगा।

आइए, इस विश्व पर्यावरण दिवस पर केवल औपचारिक पौधारोपण तक सीमित न रहकर, प्रकृति के प्रत्येक उपहार की रक्षा करने का संकल्प लें।
हम केवल पृथ्वी पर रहने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि इसके संरक्षक भी हैं।

“पृथ्वी हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली,
बल्कि यह हमें आने वाली पीढ़ियों से उधार में प्राप्त हुई है। इसलिए 

 हम सब मिलकर अपने नेतिक व सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए 
एक हरित, स्वच्छ, संतुलित और जीवनदायी पृथ्वी के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान दें।